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भारत-चीन सड़क विवाद की असली वजह

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नई दिल्ली: भूटान में चीनी सैनिकों से टकराव के बीच, खबर है कि चीनी नौसेना के युद्धपोतों ने हिंद महासागर में गश्त तेज कर दी है. पिछले कुछ समय से इनकी उपस्थिति काफी बढ़ गई है. लेकिन भारतीय नौसेना के विश्वसनीय सूत्रों की मानें तो चीनी युद्धपोत हिंद महासागर में हैं, भारतीय समुद्री सीमा के आसपास नहीं दिखाई दिए हैं.

हिंद महासागर एक ‘ओपन’ समंदर हैं, जिसमें किसी भी देश के जहाज पैट्रोलिंग कर सकते हैं. साथ ही 2008 के बाद से बने अंतर्राष्ट्रीय एंटी-पायरेसी पैट्रोलिंग गठजोड़ के बाद से तो चीनी युद्धपोत हमेशा से अरब सागर और फारस की खाड़ी के आसपास गश्त लगाते रहते हैं अपने मर्चेंट शिप्श की सुरक्षा के मद्देनजर चीनी युद्धपोत यहां पैट्रोलिंग पर रहते हैं. सूत्रों के मुताबिक, बाकी बड़े देश जैसे अमेरिका इत्यादि के भी युद्धपोत समुद्री डकैतों के खिलाफ यहां गश्त करते रहते हैं.
चीनी युद्धपोत म्यांमार के करीब अपने कोको-आईलैंड पर भी आते जाते रहते हैं. ये द्वीप म्यांमार ने चीन को सौंप दिए थे. चीनी पनडुब्बियां भी पाकिस्तान के कराची बंदरगाह और ग्वादर पोर्ट पर आती जाती रहती हैं.

लेकिन भारतीय नौसेना के सूत्रों की मानें तो भारतीय नौसेना हिंद महासागर में मौजूद सभी चीनी युद्धपोत और पन्नडुबियों पर नजर रखती है. भारतीय नौसेना इन पनडुब्बियां पर भी अपनी रूक्मणी सैटेलाइट और टोही ‘हंटर’ विमान, पी8आई से ट्रैक यानि नजर रखती है.
सिक्किम बॉर्डर पर भारत और चीन के बीच चल रहे गतिरोध का मुख्य कारण चीनी सैनिकों द्वारा भूटान के विवादित इलाके में सड़क बनाना है. जिस इलाके में चीन से तनातनी चल रही है वो इलाका चीन और भूटान के बीच विवादित है. चीन इस इलाके में सड़क बनाने की कोशिश कर रहा है. लेकिन भारत इसका विरोध कर रहा है.

सेना के उच्चपदस्थ सूत्रों के मुताबिक, अगर चीन इस विवादित इलाके, डोलाम (या डोकलांग) में सड़क बनाता है तो सामरिक तौर से ये भारत के लिए काफी खतरा हो सकता है. क्योंकि ये इलाका भारत-चीन और भूटान के ‘ट्राईजंक्शन’ पर है. ये सड़क भारत के ‘चिकन-नैक’ कहलाए जाने वाले पश्चिम बंगाल के सिलीगुड़ी से महज 42 किलोमीटर की दूरी पर है. सिलीगुड़ी में भारत के मेनलैंड की चौड़ाई करीब 35-60 किलोमीटर महज़ है. नेपाल सीमा भी यहां से सटी हुई है.

किसी अप्रिय या फिर लड़ाई की स्थिति में भारत को इस सड़क बनने का खामियाजा भुगतना पड़ सकता है. क्योंकि चीन अपने सैनिकों को तुरंत यहां ‘डिप्लोए’ यानि तैनात कर सकता है. अगर चीन के सैनिक इस चिकननैक तक पहुंच गए तो भारत के सभी नार्थ-ईस्ट राज्य मेनलैंड यानि भारत से कट जाएंगे. इसीलिए भारत इस सड़क बनाने के विरोध में है. साथ ही भूटान भी इस सड़क बनाने के विरोध में माना जा रहा है. साथ ही इस सड़क बनने से चीन ट्राई-जंक्शन तक ‘सस्टेन मिलेट्री ऑपरेशन’ कर सकता है. डोलाम करीब 300 वर्ग किलोमीटर का इलाका है.

भारत का मानना है कि अगर चीनी सेना की पहुंच ट्राई-जंक्शन तक हो जाती है तो भारत के लिए काफी मुश्किल आ सकती है. क्योंकि भारतीय सेना अपने ‘डिफेंसेस’ यानि रक्षा प्रणाली भूटान में नहीं बना सकती है.
भारत को सामरिक तौर से खतरा ये भी है कि अगर चीन डोलाम तक अपना अधिकार जमा लेता है तो भविष्य में वो सिक्किम और भूटान तक पर नजरें जमा सकता है (जैसाकि चीन साउथ चायना सी में ‘नाइन डैश लाइन’ के लिए करता है). चीनी विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता ने अब भूटान को भी अपने अधिकार-क्षेत्र में बताने की कोशिश की है. इसको लेकर एक मैप भी जारी किया गया है.

डोलाम के अलावा भूटान का चीन से नार्थ-वेस्ट इलाके में भी विवाद चल रहा है. ये करीब 700 वर्ग किलोमीटर का इलाका है. . सूत्रों की मानें तो चीन भूटान पर दवाब डाल रहा है कि वो नार्थ-वेस्ट का विवादित इलाका लेकर बदले में डोलाम इलाका चीन को दे दे. लेकिन भारत इसके लिए तैयार नहीं है. भारत के क्योंकि भूटान से अच्छे संबंध हैं इसलिए भूटान भी अभी इस डील के लिए तैयार नहीं हुआ है.

साथ ही भूटान एक तरह से ‘प्रोटेक्टी’ देश है जिसकी सुरक्षा की जिम्मेदारी भारत के पास है. वर्ष 2007 में भारत और भटान के बीच हुई संधि में दोनों देशों एक दूसरे की ‘राष्ट्रीय सुरक्षा’ को लेकर कटिबद्ध हैं.
भारत ने भूटान के सैनिकों की ट्रैनिंग देने के लिए होजांग इलाके में ट्रैनिंग सेंटर खोल रखा है. इंडियन मिलेट्री ट्रैनिंग टीम यानि ईमट्राट नाम की एक सैन्य टुकड़ी यहां तैनात रहती है जो भूटान के सैनिकों को मिलेट्री ट्रैनिंग देती है. लेकिन चीन का आरोप है कि ट्रैनिंग के नाम पर भारतीय सैनिक भूटान-चीन सीमा पर पैट्रोलिंग करते हैं. भारत चीन को इस दावे को हमेशा से खारिज करता आया है.

चीन-भूटान के डोलाम इलाके के करीब भारत के सिक्किम का डोकाला दर्रा है. भारत की यहां पर लालटेन पोस्ट है. नाथूला पास डोकाला दर्रे से करीब 20-25 किलोमीटर की दूरी पर है. सूत्रों के मुताबिक, जब चीन ने अपनी चुंबी घाटी के याटूंग शहर से डोलाम इलाके तक सड़क बनाना शुरु किया, भारतीय सैनिकों ने इसका विरोध किया और वहां पर अपने बंकर बना लिए. चीनी सैनिकों ने यहां पर भारत के दो बंकरों को तोड़ डाला. लेकिन इसके बाद भारत ने अपनी ‘रिइनफोर्समेंट’ यानि भारी बल यहां भेजा और इसके बाद से दोनों देशों के सैनिकों के बीच ‘फेस-ऑफ’ यानि गतिरोध जारी है.
चीन तिब्बत की राजधानी, ल्हासा से लेकर याटूंग तक रेल लाइन भी बिछा रहा है. यानि अगर चीन डोलाम तक सड़क बना लेता है तो आने वाले दिनों मे वो रेल लाइन ट्राई-जंक्शन तक बिछा सकता है.

आपको बता दें कि सिक्किम में भारत की चीन से सटी 220 किलोमीटर लंबी सीमा है. हालांकि अधिकतर इलाके में चीन से शांति है, लेकिन जिस इलाके में भारत-चीन और भूटान की सीमा मिलती है, वो इलाका विवादित है. भारत का सिक्किम में भूटान से 32 किलोमीटर लंबा बॉर्डर है. ठीक पचास साल पहले यानि 1967 में भारतीय सेना ने सिक्किम में चीन सेना को करारी मात दी थी. उस वक्त नाथूला और चोला-पास (दर्रों) में भारत ने चीन को करारी मात दी थी. उसके बाद से चीन ने इसे इलाके में कभी भी सिक्किम में घुसपैठ करने की कोशिश नहीं की.
इस बीच चीन से तनातनी के बीच थलसेना प्रमुख जनरल बिपिन रावत ने सिक्किम का दौरा किया था. इस दौरान उन्होनें सेना के फॉरेमेशन हेडक्वार्टर में जवानों और वरिष्ठ सैन्य अधिकारियों से चीन से चल रहे विवाद पर बातचीत की और ग्राउंड रिपोर्ट भी ली.

विवाद के बाद से ही चीन ने सिक्किम के नाथूला पास से गुजरने वाली कैलाश मानसरोवर यात्रा पर रोक लगा दी है. भारत के दो-तीन जत्थे अभी भी सिक्किम की राजधानी गंगटोक में पिछले एक हफ्ते से मानसरोवर यात्रा जाने लिए इंतजार कर रहे हैं. दो साल पहले ही चीन ने नाथूला पास से मानसरोवर यात्रा शुरु की थी. उससे पहले वो उत्तराखंड के लिपूलेख से होकर गुजरती थी.

सोमवार को चीनी विदेश मंत्रालय ने एक बार फिर 1959 में सिक्किम को लेकर तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू की एक चिठ्ठी का हवाला दिया. लेकिन चीनी प्रवक्ता नो इसी चिठ्ठी में अक्साई चिन को लेकर जो कहा था वो गोल कर दिया.

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